शब्दकार प्रकाशन

जनचेतना की प्रगतिशील पत्रिका

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परिचय

प्रिय दोस्तों ! मेरे अजीजों !
                  क्या कहूँ ! ज़माना बदल गया है, हमारी जीवन शैली ,दिनचर्या ,व्यापार,सम्पर्क,बोलचाल आदि के माध्यम, बच्चों से लेकर बड़ों तक की पढ़ाई ,मनोरंजन,ज्ञान, गुप्तज्ञान, जी.के. को जानने ,पढ़ने के लिए ही नहीं देखने को भी उपलब्ध हैं , अब किसी को किताबें या बस्ता लादने की ज़रूरत ख़त्म हो गई है,अब तो आपकी पॉकेट और एक मोबाइल ही पूरी दुनिया को समेटने के लिए पर्याप्त है !
                  पहले तमाम हिन्दी भाषी क्षेत्रों की देशज भाषाओं में अक्सर यह वाक्य सुनने को मिलते थे,अब भी हैं – “ई का हुय गौ”, “ई का है” आदि-आदि ,लेकिन अब छोटी ‘इ’ और बड़ी ‘ई’ दोनों ‘ई’ में समा गये हैं, ई-मेल, डॉट-इन, ई-पत्रिका, ई-समाचार, चुट-पुट बटन दबाया और सब कुछ सामने ! अब आपको कोई मुद्रित साहित्यिक पत्रिका खरीदनी हो तो दूर-दूर तक आपको दुकान तलाशनी होगी, या स्टेशन जाना पड़ेगा, तब भी यह ज़रूरी नहीं कि आपको मनचाही किताब या पत्रिका मिल ही जाये ,लेकिन आपके मोबाइल में सब मौजूद है,जो चाहिए सर्च करिये, आपको Amazon, Flipcart या अन्य जगहों पर आपकी मनपसन्द चीजें मिल ही जायेंगी !
                  वैसे मुझे लगता है जबसे ईश्वर ने अच्छे लोगों को बनाना बन्द कर दिया है,तबसे ये साहित्यिक पत्रिकायें भी धरती की तमाम विलुप्तप्रायः प्रजातियों की तरह विलुप्त होती जा रही हैं ,अब इनकी प्रजनन क्षमता समाप्त सी होती जा रही है ! अब न तो खरीदने वाले हैं, न पढ़ने वाले न छापने वाले !
                  सो भय्यो ! हमऊ ने “ई” को पकड़ लौ !
                  अब आपके सामने फिलहाल “ई-पत्रिका” के रूप में ” शब्दकार” पत्रिका जो साहित्यिक, सामाजिक विचारधारा की प्रगतिशील मासिक पत्रिका प्रस्तुत कर रहा हूँ , ‘ई’ का मतलब ‘ई’ नहीं कि “ऊ” न आई , “ऊ ” भी आई ! “शब्दकार” की “ई-पत्रिका” के बाद इसी वर्ष आपको इसकी मुद्रित प्रतियाँ भी प्राप्त होंगी ! क्योंकि हमारे पहले की, हमारे साथ की और हमारे बाद की पीढ़ियों के तमाम लोगों का अभी भी मुद्रित संस्करणों से मोह भंग नहीं हुआ है और फिर अपना ” शब्दकार प्रकाशन” भी तो अपने साथ है न !!
                  आशा है मेरे इस प्रयास को आपका स्नेह,प्यार व आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होता रहेगा !

आपका शुभाकांक्षी,

पीयूष अवस्थी

मुख्य सम्पादक "शब्दकार" पत्रिका®,
शब्दकार प्रकाशन®